नवरात्रि के उपलक्ष एवं माता की स्थापना दिवस पर जनपद पंचायत फरसाबहार में कलश यात्रा अत्यंत शोभायमान हो रही थी, मानो माता ने स्वयं कन्याओं का रूप धरकर 108 की संख्या में कलश सिर पर धारण कर संकेत दे रही हो कि आज से ग्राम पंचायत एवं जनपद पंचायत फरसाबहार का हर क्षेत्र सुखमय एवं मंगलमय हो कलश स्थापित कर माता की जय घोष एवं आरती की गूंज के साथ कलश स्थापित किया गया, और माता के चरणों में अर्जी बिनयकर सुख शांति की दुआएं मांगी गई।
कलश यात्रा के दौरान माता रानी के स्थापित स्थान से 4 किलोमीटर की दूरी तय कर कन्याओं ने कलश में जल भरकर बाजे गाजे के साथ माता रानी के आगमन पर विशेष प्रकार की चेहरे में चमक लिए माता रानी के चरणों में जल अर्पित करने के लिए व्याकुल नजर आ रही थी, कहते हैं कलश में जल, मानव शरीर में आत्मा की भांति है,धर्म शास्त्रों में वर्णित वर्णमाला के अनुसार कलश को सुख,समृद्धि वैभव और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना जाता है। ज्ञात हो कि कलश के मुख् में श्री नारायण भगवान विष्णु का निवास, गले में महादेव तथा मूल में ब्रह्मदेव स्थित होते हैं, और कलश के बीचो बीच मात्शक्तियों का वास होता है, इसलिए पूजन के दौरान कलश को देवी देवता की शक्ति, तीर्थ स्थान आदि का प्रतीक मानकर स्थापित किया जाता है, और कलश यात्रा जिस भी क्षेत्र से गुजरती है वहां का वातावरण में स्थित नकारात्मक क्रियाओं का नाश हो जाता है, माता रानी के आगमन पर सकारात्मक क्रियाओं में वृद्धि होती है।
नवरात्रि का महत्व
हिंदू धर्म में नवरात्रि एक साल में चार बार आते हैं लेकिन चैत्र और शारदीय नवरात्रि का विशेष महत्व है. हिंदू नववर्षक की शुरुआत चैत्र नवरात्रि से मानी जाती है. वहीं शारदीय नवरात्रि का भी अलग महत्व है. कहा जाता है क शारदीय नवरात्रि धर्म की अधर्म पर और सत्य की असत्य पर जीत का प्रतीक है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन्हीं नौ दिनों में मां दुर्गा धरती पर आती है और धरती को उनका मायका कहा जाता है. उनके आने की खुशी में इन दिनों को दुर्गा उत्सव के तौर पर देशभर में धूमधाम से सेलिब्रेट किया जाता है. श्रध्दालु पहले दिन कलश स्थापना कर इन नौ दिनों तक व्रत-उपवास करते हैं.
नवरात्रि की पौराणिक कथा
नवरात्रि मनाए जाने को लेकर दो पौराणिक कथाएं प्रचलित है. पहली कथा के अनुसार महिषासुर नामक एक राक्षक ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर उनसे वरदाना मांगा था कि दुनिया में कोई भी देव, दानव या धरती पर रहने वाला मनुष्य उसका वध न कर सके. इस वरदान को पाने के बाद महिषासुर आतंक मचाने लगा. उसके आतंक को रोकने के लिए शक्ति के रुप में मां दुर्गा का जन्म हुआ. मां दुर्गा और महिषासुर के बीच नौ दिनों तक युद्ध चला और दसवें दिन मां ने महिषासुर का वध कर दिया.
दूसरी कथा के अनुसार जब भगवान राम लंका पर आक्रमण करने जा रहे थे तो उससे पहले उन्होंने मां भगवती की अराधनी की. भगवान राम ने नौ दिनों तक रामेश्वर में माता का पूजन किया और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर मां ने उन्हें जीत का आर्शीवाद दिया. दसवें दिन राम जी ने रावण को हराकर लंक पर विजय प्राप्त की थी. तभी तक विजयदशमी का त्योहार मनाया जाता है.

