कोसमन्दा में भोजली का पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया गया ।जय माँ दुर्गा सेवा संस्थान द्वारा भोजली प्रतियोगिता का कार्यक्रम रखा गया था जिसमें गांव के सभी महिलाओं ने इस भोजली प्रतियोगिता में भाग लिया - Chhattisgarhkimunaadi.com

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मंगलवार, 24 अगस्त 2021

कोसमन्दा में भोजली का पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया गया ।जय माँ दुर्गा सेवा संस्थान द्वारा भोजली प्रतियोगिता का कार्यक्रम रखा गया था जिसमें गांव के सभी महिलाओं ने इस भोजली प्रतियोगिता में भाग लिया




 कोसमन्दा में भोजली प्रतियोगिता आयोजित..फोटो बाई प्रथम तो कुसुम साहू बने द्वितीय

रिपोर्टर--सुरेश कुमार यादव



कोसमन्दा:-जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत कोसमन्दा में भोजली का पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया गया ।जय माँ दुर्गा सेवा संस्थान द्वारा भोजली प्रतियोगिता का कार्यक्रम रखा गया था जिसमें गांव के सभी महिलाओं ने इस भोजली प्रतियोगिता में भाग लिया

। जिसमे प्रथम पुरस्कार 501 रु.,शील्ड ,मेडल व प्रशस्ति पत्र फ़ोटो बाई सूर्यवंशी को दिया गया एवं द्वितीय पुरुस्कार 251रु.,शील्ड, मेडल व प्रशस्ति पत्र कुसुम साहू को दिया गया। एवं तृतीय पुरुस्कार 151 रु.,शील्ड,मेडल व प्रशस्ति पत्र छाया केंवट को दिया गया और बाकी दस प्रतिभागियों सांत्वना पुरस्कार से पुरुस्कृत किया गया ।।

इस अवसर पर  सरपंच गजाधर कौशिक,जनपद सदस्य संजय रत्नाकर,पंच दिनेश राठौर, संजोग बरेठ,जागेश्वर कौशिक, हीरालाल सूर्यवंशी, गोली राठौर, महेश राठौर,ग्राम बैगा, कोटवार व जय माँ दुर्गा संस्थान से हरीश राठौर, श्याम केंवट,सुरेश यादव,कपिल राठौर, भागवत राठौर, महादेव साहू, केशव कशयप, अमरनाथ कशयप, वीरेंद्र कौशिक,जीवन बरेठ,गंगा श्रीवास आदि उपस्थित थे।   जनपद पंचायत बलौदा के कृषि स्थाई समिति के सभापति संजय रत्नाकर ने  बताया कि जल, वायु, अन्न के बिना जीवन संभव नहीं है। प्रकृति पर ही हम सभी का जीवन निर्भर है। आदिवासी संस्कृति में हजारों साल से प्रकृति का आभार जताया जाता है। श्रावण माह की अष्टमी तिथि पर घर-घर में भोजली बाेने की परंपरा निभाते हैं। आठ दिन बाद रक्षा बंधन पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। लोक गीत गाकर नृत्य करके मनोरंजन भी किया जाता है।


मितान त्योहारके रूप प्रचलित भोजली पर्व

पुराने समय मे लोग भोजली एक -दूसरे के कानों में डाल कर मित्रता रखने व निभाने की परम्परा थी।कई ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे जो केवल भोजली देकर ही निभाया जा रहा है।

सात प्रकार के बीज बोने की परंपरा

श्री रत्नाकार के अनुसार भो यानी भूमि और जली अर्थात धरती में जल, इसके बिना बीज अंकुरित नहीं होता। श्रावण माह की अष्टमी तिथि पर सात प्रकार के बीज भिगोकर नवमी तिथि पर उसे मिट्टी के छोटे घड़े, बांस से बनी टोकनी में बोया गया। ऐसी मान्यता है कि इन सातों बीज को सात माता के रूप में पूजा जाता है।महिलाएं बोए गए बीज की विशेष देखरेख करती हैं, इसे ही भोजली कहा जाता है। संतान प्राप्ति और परिवार, समाज की सुख-समृद्धि की मनोकामना के लिए भोजली बाेते हैं। भोजली दाई, सावन माता की महिमा में ''देवी गंगा, लहरा तुरंगा, हमरो भोजली दाई के भीगे आठो अंगा, अहो देवी गंगा'' गीत गाकर प्रार्थना की जाती है।

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